About Soron

आदि तीर्थ सोरो सूकर क्षेत्र का महत्व अद्धितिय हैं

सोरो सूकर क्षेत्र धार्मिक, अध्यात्मिक,मोक्क्षदायिनि,ज्ञानप्रदायिनी,तपोभुमि,शास्त्रो कीे,व पावन,पवित्र भुमि हैं।

सोरो- सोरो सूकर क्षेत्र एक आदि प्रचीन तीर्थ हैं। यह उत्तर प्रदेष के अलीगढ मण्डल के जनपद कासगंज के अन्तर्गत कासगंज से बरेली मार्ग पर स्थित है। इस तीर्थ का महत्व अद्धितिय है। यह स्थान जगत की उत्पत्ति का केन्द्र है, पुराण ग्रन्थ्रो मे जो कथाये वर्णित हैं। हिरण्याक्ष दैत्य बडा ही बलवान था, देवताओ पर चढाई करके देवताओ को जीत लिया। व लोको का अधिपति बनकर बैठा। देवता जहा तहा छिप गये भगवान की आराधना करने लगे, तब भगवान वाराह का रूप धारण इसी सूकरक्षेत्र मे जोकि ब्रम्हाजी की नासिका से 12 अंगुलमात्र प्रगट हुऐ। भक्त वत्सल भगवान वारह ने पाताल मे जाकर , दैत्य से युद्ध कर उसका वध किया। पृथ्वी का भार हरण किया। सम्पुर्ण जन मानस सुखी हुआ। देवता स्वर्ग पहुचे। भगवान अपने अवतार के उदेष्य पूरा करने के बाद, निज देह का परित्याग इसी सोरो सूकर पुण्य क्षेत्र मे किया। मार्गषीर्ष शुक्ल पक्ष ग्यारस को व्रत कर वद्धादसि कलेवर का त्याग किया उनकी यादगार स्मृति मे सदियो से मेला लगता आ रहा हैं। जब भगवान ने पृथ्वी से कहा कि जो पुराणो मे वणर््िात हैं- प्रक्षिप्तस्थिवर्गस्तुरेणु रूप प्रजापते। त्रिदिनान्ते वरारोहे ममक्षेत्र प्रभावत।। अर्थ-प्रक्षेपण किया हुआ अस्थि समुदाय भी तीन दिन मे रेणुरूप मे मेरे क्षेत्र के प्रभाव से हो जाता है। व दुसरा श्लोक मे हैं- हे देवि 60 हजार वर्ष अन्य तीर्थो मे तप करके जो फल प्राप्त होता है। वह फल मेरे इस सूकर क्षेत्र मे आधे प्रहर मे प्राप्त होता है। सोरो सूकर क्षेत्र मे महात्मा कपिल की तपस्थली, महात्मा भागीरथ की तपोभूमि, सुर्य भगवान ने भी यहां पर तपस्या की है उनका स्थन सूर्यकुन्ड के नाम से आज भी मौजूद है। चन्द्रमा ने भी यहा तपस्या की है, उनका स्थान, दूधाधारी के नाम से है। भगवान श्रीराम तीर्थ यात्रा करते हुऐ पधारे अपने पितेश्वरों का श्राद्ध कर्म किया। व यहा के महत्व का वर्णन किया,उनकी स्मृति मे मेला आज भी यहां पर लगता है। भगवान श्रीकृण्ण व बलराम भी यहा पर गाय चराने के लिए आते थे। जो स्थान बछरू के नाम से आज भी मौजूद है। श्रवण कुमार भी अपने माता पिता को लेकर यहां पर आये थे, सूकर क्षेत्र महाराज उत्तानपाद की राजधानी हाने के साथ धुव जी का जन्म स्थान भी हैं। चालुक्य वंषी – सोलंकी – क्षतियो की राजधनी होने का गौरव इसको प्राप्त है। स0 900 ई0 के लगभग यहा के शासक सोमदत्त सोलंकी थे। मुस्लिम सम्राट अकबर अपने पीने के लिए गंगाजल सोरो से ही मगाया करते थै, इस कथन का प्रमाण अबुलफजलअपने ग्रन्थआइने अकबरी मे दीया है। बंगाल के संत चैतन्य महाप्रभू जी महाराज, व बल्लभाचार्यजी महाराज ने भी पर्दापण किया, दोनो आचार्यो की चरण पदुकाये स्थापित हैं। उनकी बैठक आज भी मौजूद है, सिक्ख सम्प्रदाय के गुरू अर्जूनदेव जी, व जैनधर्म प्रर्वतक श्राी पारस नाथ की सनद आज भी मौजूद हैं, विष्व के कोने कोने से श्रद्धालु यहा पर आते है। गंगा स्नाान कर गंगाजल लेकर जाते है। इस पुन्यमयी भूमि की महाभारत से लेकर बौद्ध तक का इतिहास यह नगरी अपने आप मे समाये हुऐ है। स्वयं महात्मा बुद्ध ने इस नगरी मे कई बार पदापर्ण किया, बौद्ध ग्रन्थो मे सोरो के लिए सोरम्य लिखा गया हैं।रामचरित मानस के रचियता महाकवि गोस्वामी तुलसी दास की जन्म भुमि भी है।आधुनिक समय मे प0 जवाहर लाल नेहरू, म0 गांधी जी, व लाल बहादुर शास्त्री के फुल लाकर पिन्ड क्रिया हुई थी, सारे तीर्थाे की यात्रा करके तीर्थ यात्री यहा आकर गंगाजल सोरो घाट से ही भरते हैं। उनका विश्वास सत्य है, कि जब अपने घर पर जाकर गंगोज, उत्सव करते है। तो गंगाजी उनकी लोठी मे उमडती है। वह गंगाजल आये हुऐ कार्यक्रमो मे मेहामानो मे वितरण किया जाता है। रिर्पोट-बिक्रम पाण्डेय

योगेश्वर मन्दिर मे 85 वर्षेा से हो रहा हैं,राम नाम लेखन कार्य

विशेष आकृष्ण पीपल के वृक्ष पर हनुमान जी की दक्षिण मुखी छाया

सोरो-सोरो तीर्थ नगरी मंे मोहल्ला योगमार्ग स्थित योगेश्वर मन्दिर का इतिहास लगभग 5000 हजार वर्ष पुराना हें। मन्दिर के महन्त घनश्याम तिवारी ने बताया कि यह मन्दिर राजा सोमदत्त सोलंकी के समकालीन भी हैं। इस मन्दिर की विशेषता यह हैं कि यहा पर पीपल के पेड पर स्वयं प्रगट हनुमान जी दखिण मुखी की छाया निर्मित मुर्ती आज भी मौजूद हें। जिसकी पूजा कर श्रद्धालु अपनी मनोतिया मागते हैं,पुरी होने पर यहा पर हनुमान जी का लंगोट चढाकर ,यज्ञोपवीत धारियो के लिए भोजन कराकर पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं। इस स्थन पर लगभग 85 वर्ष पहले जैराम नाम के बाबा यहा आये थे उनके द्धारा राम नाम का लेखन कार्ये संचालित हुआ था,जो आज भी निशुल्क संचालित हैं। इस मन्दिर मे शिव परिवार ,हनुमान जी का स्थन ,व अन्य माता का मन्दिर व राम नाम की पुस्तर्को का संग्रालय मौजूद हें जिसमे हजारो की संख्या मं पुस्तके सुरक्षित मौजूद हैं। यह एक तीर्थ नगरी का अति प्रचीन सिद्ध स्थन हैं जिसकी पूजा करके सभी भक्तो की मनोकमना पूर्ण होती है।

नर्मदेश्वर महादेव मंदिर की महिमा

सोरों की गरिमा अदुतिय है

soron सोरों एक भव्य तीर्थ स्थल है जो गंगा माँ के आशीर्वाद से बसा हुआ है| यह शूकर-क्षेत्र के रूप में जाना Soron, एक आकर्षक शहर है और एक नगर निगम के बोर्ड और उत्तर प्रदेश पटना पक्षी अभयारण्य के कांशीराम नगर जिले में कासगंज तहसील में एक प्रमुख हिंदू तीर्थ स्थल Soron के आसपास के क्षेत्र में एक प्रमुख पर्यटन स्थल है। यह सभी को कवर करने के लिए एक लंबे समय तक ले जाएगा कि इतने सारे मंदिरों और इस शहर में अन्य पवित्र स्थान रहे हैं। उनमें से कुछ सोमेश्वर महादेव, मानस मंदिर, परशुराम मंदिर, बारह भगवान मंदिर, श्याम बारह मंदिर, रघुनाथजी मंदिर, Bhuteshwar महादेव, Batuknath मंदिर, और श्री गंगा माता तेली वाला मंदिर हैं। भगवान राम की एक प्राचीन रघुनाथजी मंदिर एक 130 किलो पीतल की घंटी के साथ है।

Soron भी एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थान है। Soron भी SHUKAR क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। इस शहर में दूर है और व्यापक यात्रा से भक्तों सर्वशक्तिमान के संबंध में भुगतान करते हैं और आशीर्वाद लेने के लिए। Soron भगवान राम की प्रशंसा में रामचरितमानस की रचना की जो महान भारतीय कवि तुलसी दास का जन्म स्थान माना जा रहा है। Soron के कुंड के निकट लोकप्रिय श्री Ladoo घाव का निशान बालाजी के रूप में जाना जाता है जो भगवान हनुमान की एक बहुत प्रसिद्ध मंदिर है। इस मंदिर के पुजारी वर्तमान, अतीत और भविष्य को देखने की शक्ति भगवान हनुमान की दिव्य आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और पुजारी पर प्रदान करने के लिए तपस्या प्रदर्शन किया है माना जाता है। एक बड़ी सांप्रदायिक दोपहर के भोजन के देवी jaagran के साथ हनुमान जयंती के अवसर पर हर साल आयोजित किया जाता है। कस्बों और शहरों से लोग दूर दूर भगवान श्री श्री Ladoo घाव का निशान बालाजी को उनके सम्मान दिखाने के लिए आते हैं। इस मंदिर के पास श्री वराह भगवान के मंदिर है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, यह Hiranyaksh दानव पृथ्वी चुरा लिया है और Soron के कुंड में छिपा दिया है कि माना जाता है। भगवान विष्णु तो, वराह के अवतार ले लिया दानव को मार डाला और अपने मूल स्थान को पृथ्वी बहाल। इस प्रकार, इस मंदिर बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाने के लिए बनाया गया था। Soron मूल रूप से एक पवित्र जगह है। कई मंदिरों यहाँ स्थित है और मुख्य रूप से राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात और भारत के कई हिस्सों से लोग मंदिरों की यात्रा करने के लिए यहां आ रहे हैं। Soron और बहुत प्रसिद्ध स्थान से 12 किमी दूर है जो Kachhla नामित गंगा नदी पर एक पुल है, लोगों को पवित्र गंगा पर स्नान लेने के लिए यहाँ आते हैं।


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