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आदि तीर्थ सोरो सूकर क्षेत्र का धार्मिक स्वरूप

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सोरो सूकर क्षेत्र मे बटुकनाथ मन्दिर मे श्रीयन्त्र

सोरो – सोरो सूकर क्षेत्र मे आदिशंकराचार्यके द्धारा एक श्रीयन्त्र की स्थापना की गई थी,जो आज भी उसी रूप मे वर्तमान मे मौजूद हैं।इसी स्थन पर भगवती दुर्गा का प्राचीन स्थान भी स्थित हैं।जिसकी आराधना हजारो की संख्या मे एकत्रित होकर भक्तजन करते हैं।नवरात्रो मे मां भगवती का जागरण व सुन्दर सजावट से भक्ता दर्शन कर आन्नद प्राप्त करते हैं।व एक भव्य दार्शनिक मेले का भी आयोजन भी किया जाता हैं। यह स्थान बच्चो के मुडन संस्कार के लिए भी प्रसिद्ध हैं। तीर्थ नगरी से समीपावर्ती क्षेत्र के अतिरिक्त मथुरा के चतुर्वेदी समाज के बच्चो का मुण्डन इसी तीर्थ मे सम्मपन्न होता हैं। इस स्थान पर अनेक तान्त्रिको ने भी तन्त्र साधना करते हुऐ,सिद्धी को प्राप्त हुऐ हैं, व प्राप्त करते हैं।इस तीर्थ के दर्शन मात्र से व्यक्ति के सारे पाप नष्ट होजाते हैं।
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रिर्पोट- बिक्रम पाण्डेय 17.04.2015

सोरो सूकर क्षेत्र मे गृध्रतीर्थ


सोरो-गृध्रवटतीर्थ मे सबसे पुराना वटवृक्ष वर्तमान मे आज भी मौजूद हैं।वराहपुराण मे इस तीर्थ का महत्व बहुत ही विस्तार से हैं। इस तीर्थ मे केवल स्नान एवं पितरो को जलांजलि मात्र देने से व्यक्ति कई हजार वर्षा तक देवताओ के साथ इन्द्रलोक मे निवास करता हुआ। अन्तत श्वेत दिप मे वाश करता हैं।इस तीर्थ का इतना अधिक प्रभाव हैं।कि एक बार अकस्मात वाणें से विद्ध होकर गिरा हुआ गिद्ध भी मनुष्य योनि को प्राप्त हो गया।वराह पुराण के 137 वें अध्याय मे इस कथा। का सविस्तर वर्णनप्राप्त होता हैं।यह गृध्रवट लहरा रोड स्थित वटकनाथ धाम के नाम से आज भी मौजूद हैे।यह गृध्रवट विश्व के चार वट वृक्षों मे से एक हैं।
1.अक्षयवट-प्रयाग
2.वंशीवट वृदावन
3.सिद्धवट -उज्जैन
4ेगृध्रवट-सोरो शुकर क्षेत्र मे।
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रिर्पोट- बिक्रम पाण्डेय 14.04.2015

लक्ष्मी नारायण जी का मंदिर

सोरो सूकर क्षेत्र मे रूपतीर्थ

सोरो- हरिपदी गंगा के किनारे दक्षिण पूर्व मे रूपतीर्थ स्थित हैं।वारहपुराणके अनुसार रूपतीर्थ मे कार्तिक शुक्ल पक्क्ष द्धादशी को स्नाान करने वाला व्यक्ति अपने कुल मे उत्पन्न 15 पूर्ववर्ती व सात परवर्ती पितरों को पितरो को तार देता हैं।उस स्नान कर्ता व्यक्ति के शरीर पर जल की जितनी बूदें,रहती हैं।उतने ही सहस्त्र वर्श पर्यन्त वह मेरा भक्त बना देता हैं।तथा रूप ,गुण,धन से युक्त होकर,रूपवती पत्नी के लिए प्राप्त कर्ता हैं।-
रूपतीर्थमिति ख्यातं क्षेत्रे सौकरवे मम।
तत्र पुण्यं प्रवक्ष्यामि स्नातस्य च मृतस्यच।।
एतिच्चिहं महाभागे तत्र सौकरवे मम।
अटमानेन मत्र्येन विज्ञेयं तु न संशय।।
वराहपुराण।।137/27-39।।
आज के समय मे इस रूपतीर्थ मे भगवान शंकर का शिवलिंग प्रतिष्ठि हैं।
रूपवान्गुणवांश्चैव जायते द्रविणन्ति।
सुरूपां लभते भार्या मदभक्तश्च पतिव्रताम्।।वराहपुराण।।137/32।।
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रिर्पोट- बिक्रम पाण्डेय 13.04.2015

तीर्थ सोरो सूकर क्षेत्र मे चक्रतीर्थ

सोरो- हरिपदी गंगाजी के पूर्वोत्तर भाग मे चक्रतीर्थ का स्थान आज भी मौजूद हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान ने अपने साक्षात सुदर्शनचक्र को प्रतिस्थापितकिया हैं।भगवान वारह स्वयं कहते हैं।कि सूकर क्षेत्र मे जो चक्रतीर्थ हैं।वहां पर मेरा चक्र प्रतिस्थित हैं,जो पवित्रआत्मा वैशख मास की द्धादसी को इस चक्रतीर्थ मे यथाविधि से स्नान करते हैं।वे 11000 वर्षो तक धन धान्य सम्पन्न विशाल कुल मे जन्म लेते हैं।जो इस चक्रतीर्थ मे प्राण त्याग करते है,वे इस तीर्थ के पुण्य के प्रभाव से कृतकृत्य होकर सांसारिक चक्र से मुक्त हो जाते हैं।आज भी यह स्थान चक्रतीर्थ मोहल्ले के नाम से जाना जाता हैं।
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रिर्पोट- बिक्रम पाण्डेय 12.04.2015

सोरो सूकर क्षेत्र मे द्वारिका धीश मन्दिर

सोरो-तीर्थ नगरी सोरो के मध्य मे स्थित भगवान द्धारिकाधीस का मन्दिर अत्यन्त प्राचीन,विषाल एवं मनोहरी स्वरूप वाला हैं।मन्दिर मे भगवान श्रीकृण्ण रूकमणी जी की भव्य मुर्तिया हैं।सम्पूर्ण मन्दिर भव्य व सुन्दर हैं। जिस पर विभिन्न प्रकार की कलाकृतियो का दर्षन होता हैं।इस मन्दिर का ईतिहास लगभग 150 वर्ष से अधिक पुराना हैं।
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रिर्पोट- बिक्रम पाण्डेय 11.04.2015

सोमेश्वर मन्दिर की पूजा करने मनोरथ होते है पूरे

सोरो- हरिपदी गंगाजी के दक्षिण पूर्व मे सोमेश्वर मन्दिर आज भी मौजूद हैं।भगवान शिव का यह मन्दिर अत्यन्त प्राचीन हैं।भगवान शिव का यह सिद्ध स्थान भक्तो कंे मनोरथो को शिघ्र पूरे करने वाला हैं। यहां हर सोमवार को विशेष रूप से रूद्राभिषेक एवं पूजा अर्चना का कार्य चलता हैं।सांयकाल के लिए विशेष भगवान शिव का श्रंगार किया जाता हैं।जिसके दर्शन करने हर सोमवार के लिए श्रद्धालू आते हैं।वर्ष यहां पर कार्यक्रम होते हैं।
पौराणिक विवरणो के अनुसार चैत्र शुक्ल पक्ष चर्तुदशी के लिए उपवास पूर्वक सोमतीर्थमे स्नान करके भगवान शिव का दर्शान करके ,विधि विधान के साथ समर्पित करनर चाहिये।ऐसा करने से व्यक्ति भगवान शिव के कैलाश धाम का सान्निध्य प्राप्त करता हैं।
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रिर्पोट- बिक्रम पाण्डेय 10.04.2015

सोमतीर्थ व चन्द्रमा का तप स्थान:
यह स्थान आज भी दुधाधारी व सोमतीर्थ के नाम मौजूद है

सोरो- सोरो सूकर क्षेत्र मे लहररोड मार्ग पर एक पवित्र स्थान दूधाधारी के नाम से व प्रचीन सोमतीर्थ स्थान हैं।वाराह पुराण मे वर्णित हैंकि चन्द्रमा ने कई कल्प वर्षा तक यहां पर अत्यन्त कष्ट साध्य तपस्या की थी।यही कारण हैं, कि यह स्थान आज सोम तीर्थ के नाम से जाना जाता हैं।तीर्थ का महत्व यह हैंकि कोई भी व्यक्ति भक्ति पूर्वक इस तीर्थ मे 8 दिनो तक उपवास एवं स्नानो उपरान्त उदक् क्रिया। करता हैं।वह 30 हजार वर्ष पर्यन्त वेद वेदागो का पारागामी होकर इस संसार मे रहते हुऐ भी समस्त अपराध रहित होजाता हैं। वर्तमान मे यह स्थान सोमतीर्थ व दूधाधारी के नाम से जाना जाता हैं।यहा पर हजारेा श्रद्धालू दर्षन के लिए आते हैं। आदि तीर्थ सोरो सूकर क्षेत्र का इतिहास की आगे की कथा अगले दिन…

बिक्रम सोरो-09.04.2015

सोरो सूकर क्षेत्र मे सूर्यतीर्थ व भगवान सूर्य की तप स्थली

भगवान सूर्य ने पुत्र कमाना से कई वर्षो तक तप किया
सोरो- हरिपदी गंगाजी के उत्तर दिशा मे मोहल्ला योगमार्ग मे सूर्यतीर्थ स्थित है। वराहपुराण के अनुसार भगवान सूर्य ने पुत्र कमाना से कई कल्प वर्ष तक तप किया। भगवान नारायण ने सूर्य की तपस्या से प्रसन्न होकर ,एक पुत्र यम,एवं एक पुत्री यमी,नामक जुडवां संन्तान प्रदान की । इस तीर्थ मे जो व्यक्ति आठ दिन पर्यन्त जो व्यक्ति नियमित व्रतपूर्वक स्नान करता हैं।वह दस हजार वर्ष पर्यन्त आदि आदित्य लोक मे निवास करता हैं।व जो व्यक्ति इस तीर्थ मे प्राण त्याग करता है।वह उत्तम लोको प्राप्त करता हुआ वैकुण्ठगमन करता हैं।
इस क्षेत्र मे अत्यन्त सुन्दर सरोवर भी हैं। जो आज भी मौजूद हैं। जिसे सुर्यकुण्ड के नाम से जाना जाता हैं।इस सूर्यतीर्थ मे अनेको सन्तो ने साधना के प्रबल्य से मनोवाछित फलो को प्रप्त किया हैं। आगे की कथा अगले दिन…………………………..
रिर्पोट-विक्रम सोरो 08-04-2015

आदि तीर्थ सोरो सूकर क्षेत्र का धार्मिक स्वरूप
तीर्थनगरी सोरो मे महाप्रभू बल्लभाचार्य जी का मन्दिर

सोरो- तीर्थ नगरी सोरो सूकर क्षेत्र की सीमा मे सोरो कासगंज मार्ग पर शुद्धाद्धैतदर्शन के प्रतिपादक महाप्रभू बल्लभाचार्य के चरण चिन्हो का प्रतीकभूत यह पावन मन्दिर आज भी मौजूद हैं।नगरी मे महाप्रभू की बैठक के नाम से जाना जाता हैं।महाप्रभू बल्लाभाचार्य द्धारा पैदल परिक्रमा करके भारत के विभिन्न स्थानो पर श्रीमदभागवत महापुराण का साप्ताहिक प्रवचन किया।इस दौरान ये जिस स्थनो पर रूके ,वे समस्त स्थान बल्लभसम्प्रदाय के अनुयायियो के लिए तीर्थस्वरूप हो गये।ये सभी स्थन मन्दिर के रूप मे होने के बाबजूद भी बैठक के नाम से सम्बोधित किये जाते हैं।
सम्पूर्ण भारत वर्ष मे स्थापित महाप्रभू की 84 बैठको मे सोरो सूकर क्षेत्र की बैठक के लिए 23 वां स्थान प्राप्त हैं।इस बैठक मे महाप्रभू बल्लाभाचार्य के के चारणचिन्हो के अतिरिक्त उनके पुत्र विठ्ठलनाथ व उनके पौत्र गोकुलनाथ जी की स्मृति चिन्ह भी विद्यमान हैं।आज भी वल्लभसम्प्रदाय के अनुयायी प्रतिवर्ष हजारो की संख्या मे दर्शन के लिए तीर्थ नगरी सोरो सूकर क्षेत्र आते हैं। व आदि तीर्थ सोरो सूकर क्षेत्र का इतिहास की आगे की कथा अगले दिन……
रिर्पोट- बिक्रम पाण्डेय 08.04.2015


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